Tuesday, September 24, 2019

पत्नी ग़िनवा भुट्टो के साथ मुर्तज़ा भुट्टो

साल 1985 में शाहनवाज़ भुट्टो मृत पाए गए और संदेह व्यक्त किया गया कि उन्हें ज़हर दिया गया है.
बाद में मुर्तज़ा भुट्टो की बेटी फ़ातिमा भुट्टो ने अपनी किताब 'सांग्स ऑफ़ ब्लड एंड सौर्ड' में लिखा, "जब मेरे पिता कमरे के अंदर घुसे तो उन्होंने शहनवाज़ के शरीर को लिविंग रूम में सोफ़ा और कॉफ़ी टेबिल के बीच औंधे मुंह गिरे पाया. मुर्तज़ा ने बाद में कहा कि उन्हें उसी वक्त देख कर लग गया था कि वो जीवित नहीं हैं."
"जब मुर्तज़ा ने उनके शरीर पर नीले धब्बे देखे, तो उन्हें लग गया था कि उनके साथ कुछ अप्राकृतिक हुआ था. उन्हें शक था कि उन्हें ज़हर दिया गया है. मुर्तज़ा ने पूरे घर की तलाशी ली और उन्हें रसोईघर के कूड़े के बक्से मं एक शीशी मिली जिस पर लिखा था, 'पेंट्रेक्साइड'."
"बाद में पुलिस ने पुष्टि की कि उन्हें शहनवाज़ के 'सिस्टम' में ज़हर मिला था और ये ज़हर ख़ून के ज़रिए नहीं बल्कि नथुनों के ज़रिए उनके शरीर में पहुंचा था. लेकिन कोई ये नहीं बता पाया कि उन्हें ये ज़हर दिया कैसे गया."
उनकी मौत पर उनकी बड़ी बहन बेनज़ीर भुट्टो ने कहा, "मैं नहीं समझती कि उनकी मौत परिवार में कलह की वजह से हुई. वो एक राजनीतिक कार्यकर्ता थे और मार्शल लॉ के धुर विरोधी भी. वो जिस तरह की ज़िदगी जी रहे थे, वो काफ़ी ख़तरनाक थी. मेरा मानना है कि उनकी मौत को एक व्यापक राजनीतिक संदर्भ के रूप में देखा जाना चाहिए."
जनरल ज़िया उल हक़ की मौत के बाद जब बेनज़ीर भुट्टो प्रधानमंत्री बनीं तो मुर्तज़ा सीरिया में ही रहे.
कहा ये गया कि अभी उनके ख़िलाफ़ पाकिस्तान में विमान अपहरण का मुक़दमा चल रहा है. इसलिए उनका वहाँ आना ठीक नहीं होगा.
लेकिन मुर्तज़ा भुट्टो इस घटनाक्रम से ख़ुश नहीं थे.
उनके एक पुराने दोस्त श्याम भाटिया ने अपनी किताब 'गुडबाई शहज़ादी' में लिखा, "मुर्तज़ा से मेरी पहचान ऑक्सफ़र्ड के ज़माने से थी. दरअसल जब हम भारत और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर शोध कर रहे थे तो हमारे सुपरवाइज़र एक हुआ करते थे."
"1989 में वो मुझे दमिश्क के शेरेटन होटल में मिले और हमने सुबह छह बजे तक एक साथ बातें करते हुए 11 घंटे बिताए. मुर्तज़ा ने मुझे बताया कि उनके पिता ज़ुल्फ़िकार ने बेनज़ीर को नहीं बल्कि उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया था. 1977 में भुट्टो ने उन्हें ही उनके लरकाना चुनाव क्षेत्र की देखभाल करने के लिए चुना था."
"इस बात की पुष्टि भुट्टो के करीबी यूसुफ़ बुच ने अपने पत्रकार दोस्त ख़ालिद हसन से भी की थी. उनका कहना था कि भुट्टो अपनी बेटी को राजनीति की पथरीली ज़मीन पर नहीं डालना चाहते थे. उनका बस चलता तो वो उन्हें पाकिस्तान विदेश सेवा का अधिकारी बनाते."
लेकिन बेनज़ीर की माँ नुसरत भुट्टो ने अपने बेटे का पक्ष लिया. उनकी वापसी के लिए उन्होंने बाक़ायदा मुहिम चलाई.
मुर्तज़ा वापस आए और आते ही उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "मुझे अपने देश से काफ़ी समय तक दूर रखा गया. मुझे दो चीज़ें बताई गईं. एक तो ये कि यहाँ मेरी ज़िदगी सुरक्षित नहीं है और दूसरे अगर मैं वापस लौटता हूं तो इससे मेरी बहन की राजनीतिक स्थिति ख़राब होगी."
"कहने का मतलब ये कि उन्होंने डर और अपराध बोध की भावना पर काम किया. डर का मेरे लिए कोई महत्व नहीं था क्योंकि मुझे पता था कि मैं बेकसूर हूँ."
"हाँ, अपराध बोध की भावना ज़रूर जारी रही, क्योंकि वो पहली बार प्रधानमंत्री बनी थीं और मैं इस विचार के साथ नहीं रहना चाहता था कि अगर मैं लौटता हूँ और सरकार गिर जाती है तो मुझे इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा."
"लेकिन एक समय ऐसा आया कि मेरे लिए और बाहर रहना संभव नहीं हो सका. मेरी माँ शुरू से ही कह रही थीं कि मुझे वापस आना चाहिए."
मुर्तज़ा के वापस आते ही उनके गृह नगर लरकाना में पुलिस ने उनके समर्थकों पर गोली चला दी.
उनकी माँ नुसरत भुट्टो इससे इतनी व्यथित हुईं कि इसके लिए उन्होंने अपनी पुत्री बेनज़ीर को दोषी माना. वो उन्हें बेनज़ीर के बजाए 'मिसेज़ ज़रदारी' के नाम से पुकारने लगीं.
नुसरत ने कहा, "बेनज़ीर कहा करती थीं कि नवाज़ शरीफ़ की सरकार पुलिस सरकार है. मगर आज की सरकार पुलिस की सरकार नहीं है तो और क्या है? जो नवाज़ शरीफ़ और ज़िया उल हक़ जैसे तानाशाह किया करते थे, वो भी वही चीज़ कर रही हैं."
मुर्तज़ा और उनकी बहन के बीच कटुता बढ़ने लगी. मुर्तज़ा की ज़ुबान तीखी होती चली गई और उसका निशाना बनी तत्कालीन सरकार.
मुर्तज़ा ने कहा, "मैं कहता हूँ सोच लो. हिसाब किताब रखो अपना. मेरे कारकूनों को हाथ मत लगाओ. उनको तंग मत करो. मैं वो ईसाई नहीं हूँ कि एक तरफ़ से थप्पड़ मारो तो मैं कह दूँगा कि दूसरी तरफ़ भी मार दो. किसी ने हमें थप्पड़ मारा तो हम टाँगें तोड़ देगें उसकी."

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