जिला सिरमौर के हाटी समुदाय का मुद्दा छह
दशक से भी अधिक समय से दिल्ली सरकार की फाइलों में अठखेलियां खेल रहा है।
गिरिपार क्षेत्र के लाखों लोगों की उम्मीदों पर दशकों से पानी फिर रहा है।
जनजातीय क्षेत्र के दर्जे को लेकर हाटी समुदाय के लोग छह दशक से भी अधिक से
अपनी मांग प्रदेश व केंद्र सरकार तक पहुंचा रहे हैं, परंतु अभी भी गिरिपार
क्षेत्र जनजातीय घोषित नहीं हो पाया है। हाटी समुदाय के करीब पौने तीन लाख
लोग हर बार विधानसभा व लोकसभा चुनाव में एक बार अपनी मांग दोहराते हैं तथा
उम्मीद की किरण उनको कहीं दूर नजर आती है। हैरानी की बात तो यह है कि पूरा
गिरिपार क्षेत्र व उत्तराखंड का जोंसार बाबर क्षेत्र दोनों तमाम प्रक्रियाओं में एक साथ पले बड़े हैं तथा दोनों ही क्षेत्रों के
रीति-रिवाज, रहन-सहन, सांस्कृतिक गतिविधियां हू-ब-हू एक समान हैं।
उत्तराखंड के जोंसार बाबर की करीब 124 पंचायतें 1967 में ट्राइबल घोषित हो
चुकी हैं, जबकि इसके बिलकुल सामांनातर गिरिपार क्षेत्र की 132 पंचायतें अभी
भी ट्राइबल के लिए संघर्ष कर रही हैं।
पौने तीन लाख आबादी सुविधाओं से दूर
गिरिपार क्षेत्र करीब 1294 वर्ग मीटर में
फैला हुआ है, जिसमें 132 पंचायतों के अंतर्गत करीब पौने तीन लाख की आबादी
रहती है। गिरिपार क्षेत्र में अभी भी मूलभूत सुविधाओं से लोग कोसों दूर
हैं। क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सिंचाई व सड़क जैसी सुविधाओं
की भारी कमी है। ऐसे में गिरिपार क्षेत्र के लाखों लोग लोकसभा चुनाव को
लेकर फिर से आश्वस्त हैं कि केंद्र सरकार इस बार चुनाव से पूर्व गिरिपार क्षेत्र के हाटी समुदाय को ट्राइबल घोषित करेगी।
केंद्रीय गृह मंत्री से दो बार मुलाकात
लोकसभा चुनाव के दौरान वर्तमान गृह मंत्री
राजनाथ सिंह ने नाहन प्रवास के दौरान गिरिपार क्षेत्र को पिछड़ा घोषित
करने का आश्वासन दिया था, परंतु उस आश्वासन को भी पांच वर्ष का समय पूरा
होने को है। गिरिपार क्षेत्र के लोग बेहद ही शांत स्वभाव के हैं। पिछले छह
दशक से भी अधिक समय से लगातार इस मांग को प्रदेश सरकार के माध्यम से केंद्र
सरकार तक पहुंचाया जा रहा है। पूर्व कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के दौरान
हाटी समुदाय का एक प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से
मिला था। उस दौरान वर्ष 2011 में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज के समक्ष भी
केंद्रीय हाटी समिति के पदाधिकारियों ने यह मुद्दा उठाया था।
केंद्र सरकार को भेजी जा चुकी है फाइल
प्रदेश सरकार की ओर से गिरिपार क्षेत्र को
जनजातीय क्षेत्र घोषित करने की फाइल केंद्र सरकार को भेजी जा चुकी है।
केंद्रीय जनजातीय मंत्री इस मामले को लेकर आश्वासन दे चुके हैं, परंतु फाइल
फिलहाल केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास है। रजिस्ट्रार गवर्नर ऑफ इंडिया आरजीआई के पास भी हाटी समुदाय के लोग गुहार लगा चुके हैं। मुख्यमंत्री
जयराम ठाकुर, शिमला लोकसभा के सांसद वीरेंद्र कश्यप, सामाजिक न्याय एवं
अधिकारिता मंत्री डा. राजीव सहजल, पच्छाद के विधायक सुरेश कश्यप, शिलाई के
पूर्व विधायक बलदेव तोमर, भाजपा के प्रदेश महामंत्री चंद्रमोहन ठाकुर ने
इसी माह दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से गिरिपार के ट्राइबल
मुद्दे को लेकर मुलाकात की। इस दौरान प्रदेश सरकार की ओर से भी केंद्र सरकार से गिरिपार को ट्राइबल घोषित करने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री के
नेतृत्व में रखा गया।
जोंसार बाबर जैसा दर्जा मांग रहा हाटी समुदाय
केंद्रीय हाटी समिति के अध्यक्ष डा. अमी चंद, उपाध्यक्ष सुरेंद्र हिंदोस्तानी व वेद प्रकाश ठाकुर, महासचिव कुंदन
सिंह शास्त्री, कोषाध्यक्ष अतर सिंह नेगी, मीडिया प्रभारी उदय राम शर्मा,
सिरमौर युवा विकास मंच के अध्यक्ष सुनील ठाकुर व प्रदीप सिंगटा आदि लोगों
का कहना है कि आगामी लोकसभा चुनाव से पूर्व गिरिपार क्षेत्र के पौने तीन
लाख लोगों से जुड़ा हाटी समुदाय का मुद्दा केंद्र सरकार को प्रमुखता से
विचार में लाना चाहिए। केंद्रीय हाटी समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि
जब एक समान भौगोलिक, सांस्कृतिक व सभी प्रकार की बुनियादी सुविधाएं होने
वाले उत्तराखंड के जोंसार बाबर क्षेत्र को 1967 में ट्राइबल घोषित किया जा
चुका है, तो गिरिपार क्षेत्र के पौने तीन लाख लोगों के साथ आखिर कब तक
अन्याय होगा।
स्कूल है…डिस्पेंसरी है…ड्यूटी देना कोई चाहता नहीं
आजादी के सात दशकों के
बाद भी बड़ा भंगाल क्षेत्र में सड़क सुविधा न होने के चलते क्षेत्र में
शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए परेशान होना पड़ता है। क्षेत्र में
भले ही प्रदेश सरकार ने एक हाई स्कूल मंजूर किया है, लेकिन दुर्गम क्षेत्र
में कोई भी ड्यूटी को तैयार नहीं होता। इस स्कूल में गांव के करीब दो दर्जन
बच्चे विभिन्न कक्षाओं में शिक्षा ग्रहण करने के लिए रजिस्टर्ड हैं।
पालमपुर के एक ही अध्यापक के सहारे स्कूल चल रहा है। साथ ही गांव में
पढ़े-लिखे कुछ अन्य लोग भी बच्चों को पढ़ाते हैं। सर्दियों में बर्फबारी
होने से पहले इस स्कूल के बच्चे भी बीड़ में पहुंच जाते हैं। बीड़ में ही
इन विद्यार्थियों की आगामी पढ़ाई तथा परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। इसके
अलावा बड़ा भंगाल में किसी तरह का शिक्षण संस्थान नहीं है। दुर्गम क्षेत्र
में स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर केवल एक आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी है और यहां
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को छोड़कर अन्य कोई भी स्टाफ नहीं है। डिस्पेंसरी
में उपलब्ध दवाइयां चपरासी द्वारा ही लोगों को दी जाती हैं, लेकिन गांव में
दवाइयों का भी अभाव रहता है, जिसके चलते बीमारी के दौरान क्षेत्र के लोग
स्थानीय देवता तथा क्षेत्र में मिलने वाली जड़ी-बूटियों से ही इलाज करते
हैं। बुखार तथा जुकाम होने की स्थिति में गुच्छी तथा काले जीरे का काढ़ा
होता है। गंभीर बीमारी में मरीज कंधों पर लाए जाते हैं। क्षेत्र की
गर्भवतियों के प्रसव मामले गांव की ही एक बुजुर्ग महिला चमारी देवी सुलझाती
हैं। पशुपालन विभाग की डिस्पेंसरी का बोर्ड भी गांव में एक कमरे पर टांगा
गया है। सर्दियों के मौसम में गांव की अधिकतर आबादी बड़ा भंगाल से पलायन कर
बीड़ में रहती है। इस दौरान बड़ा भंगाल में कुछेक ही लोग अपने पशुआें तथा
घरों की देखरेख के लिए रुकते हैं। गांव से बाहर अन्य क्षेत्रों में आपात
स्थिति के दौरान संपर्क करने के लिए एक सेटेलाइट फोन उपलब्ध है। यह फोन भी
सोलर सिस्टम के माध्यम से चार्ज होता है तथा दिन भर इस फोन को सूरज की
रोशनी में चार्ज किया जाता है, जिसके बाद यह केवल दो घंटे के लिए ही प्रयोग
किया जाता है। मौसम खराब रहने की स्थिति में फोन चार्ज भी नहीं होता है।
निचली मंजिल में जानवर, ऊपर खुद का बसेरा
बड़ा भंगाल में लोग आज
भी दीपक की लौ में जीवन बिता रहे हैं। इस क्षेत्र में 2008 तक एक पावर हाउस
चलता था, लेकिन इसकी मोटर खराब होने के बाद प्रशासन ने उसे ठीक करवाकर पावर हाउस चलाने का कष्ट नहीं किया। लोग दस साल से अंधेरे में हैं। इस
क्षेत्र में एक सेटेलाइट फोन है, जो कभी प्रशासन तक संदेश पहुंचाने का काम
कर जाता है। इस क्षेत्र में लोग सजा ही काट रहे हैं। क्षेत्रवासी आज भी
सड़क या पक्के मार्ग से महरूम हैं। इस क्षेत्र में सरकार न तो लोगों को
सुविधा प्रदान कर रही है और न ही पर्यटन की दृष्टि से विकसित कर रही है। इस क्षेत्र में लाखों रुपए की फसलें या फल हर साल गल सड़ जाते हैं। लोगों को
आज के दौर में भी अपने घरों में ही जानवर रखने पड़ रहे हैं। इस क्षेत्र में
लकड़ी के दोमंजिला मकान होते हैं। नीचे व धरातल की मंजिल में लोग जानवर
रखते हैं, तो ऊपर की मंजिल में स्वयं रहते हैं। इस क्षेत्र में एक भी
शौचालय नहीं बन पाया है।
मीलों पैदल, न रास्ता, न पगडंडी
बड़ा भंगाल प्रदेश का ऐसा दुर्गम क्षेत्र
है, जहां कई किलोमीटर पैदल चलने के बाद एक क्षेत्र ऐसा आता है, जहां दो
गांवों में सैकड़ों लोग रहते हैं। इन दोनों गांवों का नाम बड़ा भंगाल है।
यहां यही क्षेत्र है, जहां आबादी बसती है। इसके अलावा चारों तरफ पहाडि़यां
ही पहाडि़यां हैं। इन पहाडि़यों को चीरते हुए इस क्षेत्र से रावी नदी
निकलती है और आगे कुछ किलोमीटर दूर जाकर चंबा पहुंचती है। इस क्षेत्र तक
पहुंचने के लिए होली (चंबा), बीड़-बिलिंग (बैजनाथ) और पतलीकूहल के रास्ते
अपनाए जा सकते हैं। रास्ता बचा नहीं है, सिर्फ कल्पना और मैप का सहारा बचा
है।